रमजान क्या है | रमजान में मुसलमान १ महीने के रोज़े क्यों रखते है | क्या आपको पता है रोज़े रखने का हुकुम खुदा ने जंगे बदर की लड़ाई के समय किया था |

 

रमजान क्या है | रमजान में मुसलमान १ महीने के रोज़े क्यों रखते है

क्या आपको पता है रोज़े रखने का हुकुम खुदा ने जंगे बदर की लड़ाई के समय किया था

 

इस्लाम धर्म में अच्छा इंसान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना ज़रूरी  है इस्लाम मज़हब की बुनियाद पाँच चीजों पर  है  और पांच चीज़ों  पर अमल करना बहुत ही  ज़रूरी है

पहला ईमान, दूसरा नमाज़, तीसरा रोज़ा, चौथा हज और पांचवा ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों कर्तव्य इंसान को  प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से परहेज़ करना। रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।

जब मुसलमान रोज़ा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है । रमज़ान में अच्छे कामों का सबाव सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है।

रोजा झूठ,गली, गीबत ( किसी की बुराइए करना ), हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसका अभ्यास यानी  पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे।

कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज़ किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करे?

इस्लामिक शरीअत के मुताबिक मुसलमान बंदों एक फर्ज रोज़ा (व्रत रखना) है। इस मुबारक बरकत महीने का आगाज हो चुका है। नमाजे एशा के वक्त तरावीह की नमाज़ अदा की जा रही है। जंगेबदर (बदर के युद्ध) से एक माह और कुछ दिन पूर्व रमजान के रोजों की फर्जियत का हुक्म नाजिल हुआ। तबसे पूरी दुनिया के मुसलमान 29 या 30 दिन के रोज़े रखते हैं। इसमें लोग सूर्य निकलने से पहले से सूर्य डूबने तक किसी भी तरह की चीज खाने-पीने से परहेज करते हैं। यह सिलसिला पूरे माह चलता रहता है। कुछ असहाब का ख्याल है कि रमज़ान गुनाहों को जला देता है। हजरत सलमान फारसी रजि. से खायत है कि हुजूर साहब ने फरमाया ए लोगों एक अजीमुलमुरत्तब और बरकतों वाला वह महीना आ रहा है, जिसमें एक रात ऐसी है, जो हजार महीनों से अफजल है। इस महीने की रातों में इबादत को अफजल करार देते हुए रमज़ान के रोजे अल्लाह ने फर्ज किए हैं। जिस शख्स ने इस महीने में एक नेकी भी या फर्ज अदा किया, उसका अजरा (बदला) उस सख्त की तरह होगा, जिसने किसी दूसरे महीने में सत्तर फर्ज अदा किए। यह महीना सब्र का है और सब्र का सिला जन्नत हैं। वह महीना नेकी पहुंचाने का है। इस महीने मोमिन की रोजी में इजाफा किया जाता है। जिस शख्स ने किसी रोजेदार को अफतार कराया, उसके गुनाह (पाप) बख्श दिए गए। उसकी गर्दन अतिशे दोजख (नर्क की आग) से आजाद की जाएगी और रोजेदार के रोजे का सवाब कम किए बगैर अफतार कराने वाले को भी रोजेदार के बराबर का सवाब मिलेगा। सहाबाकराम रजि. ने अर्ज किया हैं यह महीना ऐसा है, इसका पहला हिस्सा रहमत है, दरमियानी (मध्य) मगफिरत है और आखिरी हिस्सा दोजख से आजादी है। माह शैतान कैद कर दिए जाते हैं।

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